Sunday, 2 February 2014

मुनव्वर राणा साहब...

मिटटी में दबा दे कि जुदा हो नहीं सकता,
अब इससे ज़यादा मैं तेरा हो नहीं सकता

दहलीज़ पे रख दी हैं किसी सख्श ने ऑंखें

रोशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता


बस तू मेरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे

फिर देख इस शहर में क्या हो नहीं सकता

ऐ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला

सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता

इस खाक-ए-बदन को पहुंचा दे वहाँ भी

क्या इतना करम बादे -सबा हो नहीं सकता

पेशानी को सजदे भी अता कर मेरे मौला

आँखों से तो ये क़र्ज़ अता हो नहीं सकता


                                                  .....मुनव्वर राणा साहब

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